मैं कोई आलोचक या समीक्षक कतई नहीं हूँ। ना ही इन दोनों के लिए स्वयं को समर्थ मानती हूँ ।
किन्तु तीन चार दिन पहले पंकज सुबीर जी का उपन्यास "अकाल में उत्सव " पढ़ा तो, ह्रदय को झंकझोर गया। अभी तक दो बार पढ़ चुकी हूँ ।
पारूल
कोशिश करने पर भी उसके पात्र उतर नहीं रहे दिलो-दिमाग़ से । अतः केवल एक पाठक के तौर उपन्यास पढ़ने के अपने अनुभव लिख रही हूँ ।
हिंदुस्तान में छोटे किसान की दयनीय स्थिति व प्रशासनिक व्यवस्था के झोल तथा भ्र्ष्टाचार पर उपन्यास खुल कर रोशनी डालता है ।
पर कथा शिल्प के दायरे में रहते हुए। कंही भी भाषा ना तो बहुत ज्यादा वर्णात्मक होती है ना बोझिल । दो भिन्न परिवेशों पर चलती कहानी जो आपस में जुडी हुई भी है, कंही भी नीरस नहीं होती ।
देशकाल अनुरूप कहन की कसावट पर खरी उतरती उपन्यास की कहानी मे कुछ भी अनावश्यक नहीं है ।
उपन्यास उस अनाज के जैसा है जिसकी छान - पटक अच्छे से की गयी हो । लगता है लेखक ने अपने लिखे हर वाक्य को अपनी कसौटी पर कस कर, संतुष्ट होकर ही कथा को आगे बढ़ाया है ।
किसी प्रकार की जल्दबाजी या लापरवाही मे लेखक नहीं दिखता ।
उपन्यास के पात्र आंचलिक भाषा ,बोली, कहावतों का ही प्रयोग करते हैं। जिससे उपन्यास में आने वाले घटनाक्रमों का चित्रण इतना सजीव बन पड़ा है कि पढ़ते पढ़ते पाठक उन दृश्यों को देखने लगता है ।
रामप्रसाद व कमला ( इनकी दरिद्रता का वर्णन इतना मार्मिक है कि इन्हे नायक ,नायिका भी नहीं कहा जा रहा । ) जब भी एक साथ आते हैं तो , हर दृश्य आँखों के कौरों को भीगो जाता है ।
इस दम्पति के जीवन की मार्मिकता में छुपे प्रेम का जैसा वर्णन लेखक ने किया है , वो दुर्लभ है ।
आंचलिक भाषा के शब्द कहानी में बहुत सहजता से आते हैं, कंही भी वो जबरदस्ती ढूंसे नहीं गए हैं । भाषा शैली का चातुर्य स्पष्ट झलकता है ।
दोनो परिवेशों मे घटित घटनाओं का वर्णन निरा काल्पनिक नही लगता। लेखक ने आँकड़ो के साथ बहुत सरल भाषा मे अपनी बात रखी है, जिससे पाठक को ज़रा भी परेशानी नही होती तथ्यों को समझने में।
जीती- जागती रसीली भाषा के साथ जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उतना ही पाठक उस मे डूबता जाता है। भाषा की एक ख़ासियत यह भी है कि वह क्लिष्ठ नही है। भारी - भरकम शब्दों का प्रयोग होने से कथा अपने देशकाल से तारत्म्य में नही रहती, लेकिन इस उपन्यास के जो पात्र जिस परिवेश से है वो वंही की आम बोल-चाल की भाषा तरीक़े व लहजे का इस्तेमाल करते हैं।
अपनी पत्नी के गहने बेचने के दृश्य में गहने के पिघलने व रामप्रसाद के मन मे चल रहे मंथन का दृश्य पाठक के ह्रदय को अंतरकोश तक झकझोरता है।
एक बात तो निश्चित है लेखक ने ये उपन्यास केवल लिखने के लिए नही लिखा है। अवश्य ही इसके विषय से लेखक स्वयं भी आंदोलित रहा है। एक ज़िम्मेदार लेखक होने के नाते लेखक सामाजिक सरोकार रखता है,और उपन्यास लिख उसने अपने सामाजिक व लेखकीय दायित्व का निर्वहन किया है।
लेखक ने अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी तन्मन्यता से निभाई है जिसमें वह सफल भी हुआ है। पाठक पूरी तरह से लेखक से जुड़ कर, घटनाक्रमों मे डूब कर लेखक के रचे संसार मे अनवरत विचरता है।
लेखक बहुत प्रवीणता के साथ जंहा भारतीय किसान की दयनीय दशा का वर्णन करता है, उसी दक्षता के साथ वह हमारी प्रशासनिक व्यव्स्था की ख़ामियों पर भी रोशनी डालता है।
प्रशासनिक कार्यो, दफ़्तरों जैसे नीरस विषय को भी लेखक ने अपने लेखकीय चातुर्य का प्रयोग कर, मुहावरों , कहावतों व भाषा की सहजता के साथ रोचक बना दिया है।
एक दृश्य --
" फागुन का महीना फ़सल के पकने के लिए ही होता है। हवा मे ऐसी खुनकी व मादकता आ जाती है कि फ़सल भी झूम कर पक जाती है।" ....
खुनकी जैसे शब्द का प्रयोग फागुन की महक पाठक तक पहुँचा देता है।
यह तो महज़ एक वाक्य है ऐसे ही जीवंत दृश्य व शब्द पाठक को बाँधे रखते हैं।
किस्सागौई का माहिर यूँ ही नही कहा जाता पंकज सुबीर को।
यह उपन्यास लिख लेखक ने तो अपने सामाजिक व नैतिक दायित्व को निभा दिया है।
ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक यह पंहुचना चाहिए ।
विश्वविद्यालय के छात्रों के कोर्स मे रखने का अनुमोदन होना चाहिए। क्योंकि यह कृति हमारे देश के सबसे आवश्यक पर सब से ज़्यादा उपेक्षित व्यक्ति " किसान" के जीवन की कड़वी सच्चाइयों व कठिनाइयों से अवगत कराती है।
यह उपन्यास नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी की एक्टिंग सा है । तारीफ़ करनी है तो ले आओ शब्द कंहा से लाओगे
और कमियाँ ढूँढनी है तो ढूँढ कर बताओ। बस एक ही शब्द मे सब निहित है। वाह।
पुस्तक -- अकाल में उत्सव
लेखक -- पंकज सुबीर
प्रकाशक -- शिवना प्रकाशन
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