Wednesday, July 10, 2013

"लूटेरा" खालिस इश्क़ .....

 

इस गए शुक्रवार 'लूटेरा' मूवी देखने गए ,मूवी खत्म हुई तो पीछे से आवाज आई .."क्या खत्म हो गयी ?? ये क्या था?हमारे पैसे वापस करो .....मेरा मन हो रहा था पैसे जो लेने हैं, ले लो थोड़ी देर और पाखी के साथ बैठने दो, बेशक़ सबकी पसंद अपनी अपनी होती है। पर मै यकीन से कह सकती हूँ, जिस जिस को ये मूवी पसंद आई है उन्होंने इसे सिर्फ  देखा नहीं होगा,जीया होगा पाखी,वरुण के साथ।  वो थिएटर में नहीं थे। या तो मानिकपुर मे पाखी की हवेली में उसकी लायब्रेरी में रहे होंगे। या  पाखी से वरुण को पेंटिंग सीखते  देख रहे  होंगे कंही एक और खड़े। या तो वो डलहोजी में होंगे गिरती बर्फ के साथ  पेड़ के गिरते पत्तो को देखते ,पाखी की डूबती उम्मीदों  को देखते।


ये मूवी देखने भर की है,महसूस करने की। क्या कोई फर्क पड़ता अगर इस मूवी मे  डायलाग न होते? पाखी और वरुण की आँखे तो फिर भी उतना ही बोलती,वरुण की कशमकश और पाखी का भोलापन तो फिर भी दर्शको  के दिल में उतर ही जाता। इस मूवी को अच्छी या बुरी नहीं कहा  जा सकता।मुझे लगता है ये पैमाना इस मूवी से न्याय नहीं कर  पायेगा। ये मूवी खालिस  इश्क है,जिन्होंने कभी  किया होगा उन्हें समझ आई होगी।
                                                                               
                                                                   

मै इश्क़ की बात कर रही हूँ,प्यार की नहीं आजकल तो लोग प्यार भी नहीं करते,बस मतलब की बानडिंगस होती है। सोशल स्टेटस,बैंक बैलेंस देख कर ये तो प्यार ही नहीं  इश्क तो कंहा ठहरता  है।

जिसने इश्क किया होगा वो ही समझ सकता है पाखी क्यूँ एक भी शब्द नहीं लिख पाई इतने दिन और वरुण के आने पर पूरा पेज लिख कर कैसे सो गयी वो। हालाकि उसने लिखा वरुण के ही खिलाफ। जिससे इश्क़ हो उससे उसी की शिकायत सबसे बड़ा काम होता है। इसमे सामने वाले के साथ खुद पर भी गुस्सा आता है झुन्ज्लाहट   होती है। दिल और दिमाग  दोनों अपनी अपनी और खींचने  की कोशिश करते  हैं। पाखी की झुन्ज्लाहट भी शायद ऐसी ही थी। 

पर इश्क अपना काम कर चुका था उसमें सब न्योछावर हो जाता है,और जब सब न्योछावर हो गया हो तो कुछ बचाने की जदोजहद बेमानी है।इसी लिए शायद वरुण पाखी को जिंदगी की नई पत्ती सौंप  कर  गोली खाने निकल पड़ा। इश्क हो चुका था, सब न्योछावर हो चुका था  फिर बचाना क्या था और किस के लिए। वो अपना अंत जानता था,पर पाखी को जीवन की नई उमंग दे कर जाना चाहता था।


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parul singh

7 comments:

  1. बहुत सुंदर समीक्षा , लीक से हटकर लगती ये फिल्म कुछ , समय मिलते ही जरुर देखेंगे , बहुत आभार

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  2. सुन्दर समीक्षा ... अभी देखि नहीं पर अब देखनी पड़ेगी ...

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  3. सही कहा है आपने!!खूबसूरत फिल्म है!!ऐसी फ़िल्में आजकल बनती नहीं!

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  4. देखकर कुछ कहने की स्थिति बनेगी...समीक्षा के लिए बधाई...

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  5. मूवी देखी नहीं वरन दिल से महसूस की है .बहुत सुंदर समीक्षा .बधाई

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