Saturday, August 3, 2019

Review movie:khandani shafakhana

https://youtu.be/YA_meslf-aU


https://www.youtube.com/user/pbsingh31

सावन सबका हो


सभी सुहागनों को सावन की हरी मेहंदी,चूड़ी और साड़ी की बधाई!! 🙄 क्यूँ भई? सावन तो सबका है,सिंगल का भी married का भी। मौसम,हवाएं, चाँद,सूरज सबको मुबारक। मुझे सजने सवरने रंगों से परहेज या आपत्ति नही। बहुत पसन्द हैं,पर अपने ही दिल की उमंग तक को केवल इस लिए महसूस करना के किसी से हमारा कोई ख़ास सम्बन्ध है,ये भला कैसे हो सकता है?
बारिश देख कर मन तो झूले झूलने का सबका हो सकता है। सावन मैरिटल स्टेटस और जेंडर की क़ैद से आज़ाद होना चाहिए। दिल की ख़ुशी मे if, but नही होते। सबको सावन मुबारक💖
पारुल सिँह❤️

Wednesday, January 2, 2019

दिल ही तो है 1

नए साल का दूसरा दिन था वो भी आज ही की तरह।2 जनवरी 2017। शाम हो गई थी और अभी भी मेरी पैकिंग करनी बाकी थी। क्योंकि अगले दिन मुझे हॉस्पिटल जाना था,जँहा 5 जनवरी को मेरी ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी। मेरे हर्ट की 2 वाल्वस लीक कर रही थी और इनमें से mitral वाल्व सीवियर लीक कर रही थी जिसे बदल कर आर्टिफिशियल वाल्व डाली जानी थी। इस लिकेज जिसे mitral regurgitation कहते हैं, की वजह से मेरे हार्ट और lungs पर भी काफी बुरा असर आलरेडी हो चुका था, डॉक्टरस के अनुसार। खैर ये बातें डॉक्टर्स के ऊपर ही छोड़ देते हैं। मुझे इन सब medical बातों और टर्म्स में से वो ही बातें अपील करती हैं। जो thrilling हों। जैसे, ये बहुत सीवियर डैमेज मेरी बॉडी को दे चुके थे,मेरी साँस उठने, चलने के साथ साथ अब बोलने पर,बाते करने पर भी फूलने लगी थी, मैं जो पिछले एक साल से बहुत बीमार हूँ और पिछले 6 महीनों से तो लगभग बेड पर ही हूँ।.. 
ऐसी बातें मुझे थ्रिल देती थी। मुझे कोई बीमार होने का शोक नही है,पर हो जाऊं तो रोने,कराहने की आदत नही मुझे पसंद नही आता।
मेरे जैसे लोगो को फ़िल्मी कहा जाता है। हो सकता है,मैं फ़िल्मी हूँ।पर मैं इस से अलग नॉर्मल लोगो जैसा behave चाहूँ तो कर नही पाती ज़्यादा देर ।पता नही क्यूँ। 
मैं ये सब किसी की सहानुभूति लेने के लिए करती हूँ क्या? जब मैंने ये सवाल ख़ुद से पूछा तो जवाब आया कि ये तो आखिरी चीज़ होगी सहानुभूति में किसी की लेना चाहूँ तो।
थक हार कर फिर वो ही बन जाती हूँ, जैसी में हूँ। 
कुल मिला कर इस थ्रिल पसंद मोहतरमा को एक साथ बहुत सारे थ्रिल प्रोजेक्ट मिल गए थे।
Psychology कहती है कि अपनी या किसी नज़दीकी की ऐसी बीमारी के बारे में सुन कर acceptance आने में वक़्त लगता है। मेरी भी ऐसी बेचैनी वाली रातें थी जब आप सोचने लगते हो अपने पीछे छोड़ जाने वाले अपने बच्चों और माँ बाप और अपने पति को । पर उन कुछ घंटों का मैं जिक्र नही करना चाहती वो नितांत मेरे अपने थे।
 और वैसे भी सच्ची बात ये है कि बोरिंग थे, उन मे ये थ्रिल नही था ना कि मुझे 'जीने की राह' मूवी की तनुजा जैसी बीमारी थी जो ज़रा सी इमोशनल या उसकी गैरमर्ज़ी की बात सुनते ही हाँफने लगती थी। या 'मिली' फ़िल्म की जया भादुड़ी की बीमारी थी कि वो कुछ दिनों में दुनिया को अलविदा कहने वाली है।
या फिर हमारे दौर की फ़िल्म 'बलमा' की आयशा जुल्का वाली बीमारी हो कि उसका हवा पानी बदलना होता है। तीन फिल्में एक मैं, बहुततत्त नाइंसाफ़ी थी।
घर वाले मेरे पीछे छुप कर रोते थे या आपस में चिंता करते थे। मुझे नही मालूम, न मैंने जानने की कोशिश की। कहा ना, मुझे तो अपने थ्रिल को जीने से फ़ुरसत नही थी।
पिछले 6 महीने में बिस्तर पर पड़े पड़े मैंने यूट्यूब के सब मुशायरे और लोंगो के इंटरव्यूज़ जब ख़ूब देख लिए तो 
Shuruti arjun anand नाम के ब्यूटी चैनेल पर हर तरह का स्किन केअर और मेकअप मैं सीख चुकी थी। फ्री में मेकअप सीखा जा सकता है किया नही जा सकता।सो इस बीमारी का पता लगते ही,एक दिन dr की विज़िट के बाद मैंने एक मॉल की तरफ़ अपनी कैब मुड़वा दी।
अपनी यूट्यूब जानकारी का उपयोग कर मैंने साढ़े तीन हजार रुपये के कॉस्मेटिक्स ख़रीदे। मॉइस्चराइजर की जगह ग्लिसरिन और गुलाबजल का मिक्सचर लगाने वाली मैं दिल पर हाथ रख पहली बार इतने रुपये मेकअप पर खर्च कर पाई।
घर जाते वक़्त फोन पर मैंने अपने dr को भी तबीयत पूछे जाने पर बताया कि dr बहुत शांति है दिल को आज,परफ़ेक्ट धड़क रहा है पति के पैसे खर्च किये हैं।
सो सर्जरी का मालूम होने से सर्जरी होने तक हॉस्पिटल में भी मैं सुबह उठते ही नहा कर सबसे पहले मेकअप करती थी। सर्जरी के बाद भी जब क्रिटिकल केअर और आई सी यू से रूम में शिफ्ट हुई तो मेकअप करती थी।घर वापस आने पर ते क्रम कुछ ढीला हुआ,क्यूँकि तब एक तो आपके पैन किलर्स बंद हो जाते हैं और कुछ ऑफ्टर सर्जरी इफैक्ट्स भी होते हैं।
एक अलग तरह का एनर्जी इस रूटीन से मुझे मिलती थी अब ये वास्तव मैं क्या था ये तो कोई साइकोलॉजिस्ट ही बता सकता है, बहरहाल मैं खुश थी।
घर वालों को जितना इमोशनल ब्लैकमेल मारा जा सकता था मैं कर रही थी।
हर किसी को बाक़ायदा छोटी ऊँगली पर नचाया जा रहा था। अरे मैं क्या करती वो तो इस से ख़ुश थे। तो बेसिकली तो मैं उन्हें ख़ुशी ही दे रही थी।
जो स्पेशल ट्रीटमेंट मिल रहा था मुझे उस में मज़ा आ रहा था।
इन बीते दिनों बिस्तर पर अकेले पड़े पड़े इतनी तकलीफें झेलने के बदले अब मज़े के दिन आ गए थे। जिन रिश्तों से मिली कुछ तकलीफे दिल में थी,वो भी उनकी मजबूरी समझ कर भुला दी थी।मजबूरी इस लिए कि मुझे कोई दुःख देना या मेरे साथ कुछ बुरा करना भगवान के अलावा किसी इंसान के लिए बहुत मुश्किल है। लोग चाह कर भी मेरे साथ बुरा नही कर पाते। सो जो कर पाया होगा तो जरूर कोई बहुत बड़ी मज़बूरी उसकी रही होगी मैं ये सोचती हूँ,  हाँ नही तो। 
ख़ैर, 2 जनवरी 2017 की शाम को विवेक (हिंदी में मेरी जेठानी का बेटा) (इंग्लिश में आप समझ लो वो ब्रदर इन ला और सिस्टर इन ला वाले झग़डे।) आ गया,बिन बुलाए ही कि चाची मुझे मालूम था ये काम मुझे ही करना है। उस ने और संगीता( इनसे मुलाकात बाद में कराऊँगी,अभी बस ये समझ लें कि ये एक रिश्ते से मेरी भाभी लगती हैं और बहुत ही प्यारी और हँसमुख लड़की है जिसने सर्जरी के बाद मेरी बहुत देखभाल की और हंसाया भी)  ने मेरे कुछ कपड़े, रिपोर्ट्स,दवाएं और वो ही थर्मस वगैरह जो रखते हैं 

हॉस्पिटल के लिए वो सब पैक कर दिया। हालाँकि इन सब की हॉस्पिटल में कुछ भी जरूरत नही पड़ी। फ़ाइव स्टार हॉटेल की तरह ही होते हैं फ़ाइव स्टार हॉस्पिटल। सब कुछ वँहा मिलता है।और कपड़े तो वो आपको शोले फ़िल्म के जय वीरू वाले पहना देते हैं जाते ही। इस दिशा में हॉस्पिटलस को काम करना पड़ेगा अभी बहुत थोड़े अच्छे अट्रैक्टिव बल्कि डिज़ाइनर कपड़े उपलब्ध कराने चाहिए।हाँ नही तो, सेल्फ़ी फीकी फीकी आती है। मेरा तो चलो कुछ नही मैं तो हूँ ही बहुत सुंदर ऊपर से उन दिनों मेकअप भी कर रही थी। आँखे भी बड़ी बड़ी हैं।
मैं उन दिनों रोज का एक वीडियो शूट करती थी व्लोग कह सकते हैं उसे। अपनी बड़ी बेटी को रोज की गतिविधियाँ बताने के लिए।पर उसे कभी भेजे नही। दिसंबर के अंत में जब वो घर आई तब ही उसे सर्जरी के बारे में बताया और उसे वीडियोस दिखाए। और एक जनवरी को ही उसे वापस भी भेज दिया। वो यँहा रहती तो मुझे चिंता होती रहती हॉस्पिटल में उसकी। जँहा वो पढ़ती हैं वँहा उसका कॉलिज हैं दोस्त हैं। सो मैं टेंशन फ्री थी।
रात को हम चार पाँच लोगों ने ख़ूब गप्पे मारे, खूब हँसे।संगीता ने कुक से मेरी पसंद का खाना बनवाया। और सबके फोन कॉल भी आते रहे।कि आल द बेस्ट ठीक हो जाओगी। मेरे मम्मी पापा कल हॉस्पिटल ही पहुँचने वाले थे।
मैं डॉक्टरस की pet हूँ।मुझें डॉक्टर जो भी बताते हैं वो सब सच लगता है। उनके निर्देशों का भी मैं अक्षरशः पालन करती हूँ।फिर घरवाले चाहे जो कहें। इस से मेरी फ़िक्र ख़त्म हुई और dr की शुरू हुई मुझे ऐसा ही लगता है।
मेरी खास पैकिंग तो 3 जनवरी की सुबह हुई। मेकअप किट। मेकअप कर लेने के बाद। 3 जनवरी को क्या हुआ वो 3 जनवरी यानि के कल ही बताऊंगी। कुछ फोटोज़ साथ लगा रही हूँ। 1 और 2 जनवरी 2017 के। देखिए अपनी दिल की बीमार दोस्त को। 😊😃
Happiness always
🍀पारुल सिँह🍀





Monday, October 30, 2017

रात

रात फ़कत रात नही हुआ करती
नशा होती है
और ये नशा मेरे सर चढ़ कर बोलता है
मुझे रात में बस एक ही बात पसंद नही
और वो है,सोना
किसी के लिए रात
आबिदा परवीन है
किसी के लिए मेहदी हसन
तो किसी के लिए जगजीत सिंह
मेरे नजदीक रात है
लग जा गले के फिर ये हसीं रात हो ना हो..
रात उडती हुई बदली है एक
जो ऊंचा उड़ा ले जाती है
किसी के लिए ये बदली 
सिगरेट के धुएं से बनती है। तो 
किसी के लिए स्कॉच या व्हिस्की से
किसी के लिए कॉफी के झाग से
मेरे नजदीक ये बदली चाय से उठने वाली भाप है
किसी के लिए रात, रात की रानी होती है
किसी के लिए गमकता फूटता महुआ 
किसी के लिए हार-सिंगार होती है,तो
किसी के लिए रात चम्पा हुआ करती है
मेरे नजदीक रात रजनीगंधा है
रात, रात नही
यादों का मुशायरा होती है
रात में तसव्वुर की बज़्म सजती है
एक के बाद एक यादों की ग़ज़ले पढी जाती है
रात बैतबाजी होती है जिसमे
बहके हुए दिल को 
खुद ही जवाब दे देकर
समझाते हैं।
कहने को तो रात मौसम के हिसाब
से छोटी बड़ी होती हैं।
पर हिज्र की रातें
सबसे लम्बी रातें होती हैं।
रात के दामन में खुद को ढूंढना 
सबसे आसान तरीका है खुद से मिलने की।
🍀पारूल सिंह 🍀
 

Monday, October 23, 2017

आवश्यकता निमित एक देह मात्र मै

आवश्यकता निमित एक देह मात्र मै 
....
 ....
 इसके आगे लिख नहीं पाती
  जब जब भी
 अंतर्मन में भावो का बवंडर उठता है 
इतना तेज होता है कि
 शब्दों के सांचो मे
 भाव टिक ही नहीं पाते 
भाव ममता , स्नेह और प्यार के
 जिन पर अपने व्यर्थ होने का भाव भारी है
 अंतर्मन में
 मेरे "भाव" "शब्द" और "मै" 
हम तीनो ही प्रसव पीड़ा से गुजरते है
 पर कविता कागज पर नहीं आ पाती
 देर सवेर इस  पीड़ा से गुजर
 हर कविता अंतर्द्वंद  जीत जाती है 
किन्तु मेरी इस  कविता की किस्मत मे
 केवल प्रसव पीड़ा है
 ये  आकर रूप नहीं ले पाएगी 
ये आज भी मेरे साथ है
 "मै" ,मेरे "भाव" और "शब्द" 
हम तीनो  ही
 आज फिर इस प्रसव पीड़ा से गुजरे हैं 
 इसी पीड़ा मे  बुदबुदाती रही हूँ  
आवश्यकता निमित एक देह मात्र मै
 ....
......
इसके आगे आज भी नहीं लिख  पाई .....
पारूल सिंह

Monday, September 18, 2017

तिलिस्म

कभी-कभी ऐसे बात करते हो
के एक दम रूहानी सा
तिलिस्म बिछ़ा देते हो
 मुझ से तुम तक।
कुछ भी दरमिया नही।
मीलों की दूरी नही,हवा नही,
दरख्त,दरिया कुछ भी तो नही।
बस करोड़ों ध्वल रोशनी-पुजँ।
इधर मैं उधर तुम,
ना कोई लफ्ज़ ना आवाज।
बस दो जोड़े मुस्कुराती आँखें
एक दूसरे से जुड़ी हुई,
" मैं यहाँ हूँ"
 "हाँ तुम हो"
 "मैं यहाँ हूँ"
 "हाँ तुम हो"
 "मैं हूँ"
 "जानती हूँ"।
पारूल सिंह

Thursday, September 14, 2017

विश्वास


यार ये आधा,पौना,तिहाई,चौथाई क्या होता है? विश्वास है तो है,नही है तो नही है। सूद थोड़े है जो सौ का तीस हर महीने बढ़े ही बढ़े। किसी पर विश्वास हो गया तो हो गया। दिन में पचास बार क्या तोलना कि विश्वास लायक है कि ना है। ये बात हो गई तो विश्वास बढ़ गया,वो बात कह दी तो कम हो गया। पहले विश्वास पकाओगे,फिर भरोसा लाओगे।तब कहीं जा कर कारज पूरा होगा। इतने सालों में तो दो चार विश्वास टूट जाएं और दो चार खरे लोग मिल जाएं वो अच्छा है। सालों तक एक बन्दे पर विश्वास को तोलो मोलो फिर वो भी धोखा निकला तो गई भैंस पानी में। मुझे तो सीधा सा फण्डा ये समझ आया कि ज़िन्दगी में जिस के लिए जो गट फिलिंग आए,उसे बेस बना लो और कर लो विश्वास या नकार दो सिरे से। इसमे दो ही बाते होंगी, या तो वो भरोसा करना सही होगा,एक काम पूरा होगा।एक अच्छा रिश्ता या कुछ भी जो अपेक्षित हो वो मिलेगा। या फिर भरोसा टूट जाएगा।तो क्या गम, तजुर्बा तो मिला।ये तजुर्बा अगली गट फीलिंग का बेस बनेगा।और साथ में ये भावना रहेगी कि मैं तो अपनी तरफ से सच्चा था।ईमान से तो सामने वाला गया। और कई बार तो मैंने देखा है कि आपके अटल विश्वास के चलते हेरा फेरी करने वाला भी आपसे धोखा नही कर पाता।
सो विश्वास या तो हो पूरा पूरा या बिल्कुल ना हो। ठीक है मान लिया आजकल इंटरनेट के युग में जानकारियों की अधिकता है।पर जानकारी ज्यादा हो और कच्ची पक्की हो तो बहुत ही खतरनाक है। लोग गूगल पर पढ़ पढ़ कर चीजों की इतनी जांच पड़ताल करते हैं इतनी जिरह करते हैं कि पूछो मत। लोग डॉक्टर को विजिट करते हैं तो समझ नही आता ये डॉक्टर को दिखाने आए हैं या बेचारे डॉक्टर का आज पैनल इन्सपेक्शन  है। नेट पर मेडिकल रिलेटिड आपकी जानकारी का डॉक्टर की नॉलिज, प्रैक्टिकल नॉलिज व प्रैक्टिस नॉलिज से क्या मुकाबला? प्रमाणिकता ही क्या आपकी जानकारी की ? जिसका जो काम है वो उसे करने दीजिये। विश्वास करना सीखिये लोगो पर। और आप को क्या लगता है डॉक्टर को समझ नही आता ये सब ?आता है? सुबह से शाम तक आप से हजारों से मिलते हैं वो। पर बीमार के मनोस्थिति समझते हुए वो समझाने की कोशिश करता है,इग्नोर करता है या झल्ला भी सकता है। खूब रखिये जानकारी, पर  जहां दूसरे के दिमाग से काम चले वहां अपना लगाना ही क्यूँ?  कर लीजिए एक बार प्रॉडक्ट व मेडिकल सर्फिंग। पर एक बार जहां जम गए,जमे तो रहिए। ठीक है अपवाद हर जगह हैं पर।विश्वास कीजिए।निश्चित हो रहिये।एक ही इन्सान हर फ़न में माहिर नही हो सकता। सुकून के लिए तो ये ही करना सही है। ऐसा भी नही कि मैंने ये ऊपर लिखी गलतियाँ ना की हों। कुछ तो की है तभी तो लिख रही हूँ। पर जादू करता है,हवा से हल्का बना देता है सहज विश्वास। विश्वास से ही चमत्कार होते हैं और चमत्कार उन्हीं के साथ होते हैं जो इन में विश्वास करते हैं। वो अल्लमा इकबाल का शेर है ना--
अच्छा है दिल के पास रहे पासबान-ए-अक्ल 
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़िये।
पारूल सिंह 

Saturday, September 9, 2017

प्रेम गली अति सांकरी

प्रेम वही है जिसमें सम्पूर्ण समर्पण हो पर स्वाभिमान के साथ। प्रियतम भी वही है जिसे संपूर्ण समर्पण तुम्हारे स्वाभिमान के साथ स्वीकार्य है।जो तुम्हारे सम्पूर्ण समर्पण के साथ तुम्हारे स्वाभिमान के लिए भी सजग हो। प्रेम को समझना है तो सम्पूर्ण समर्पण व स्वाभिमान के मध्य की महीन रेखा को समझना होगा। अहम या मैं व स्वाभिमान के अन्तर को समझना होगा। जिस तरह तुम्हें रीढ़विहीन प्रेमी नहीं चाहिए उसी तरह प्रियतम को भी रीढ़विहीन प्रेमिका पसंद नहीं है। जो तुमसे स्वाभिमान त्यागने की इच्छा करे वह प्रेम नही। और स्वाभिमान त्यागने की प्रवृत्ति तुम में है तो तुम गुलामी में हो प्रेम में नही। प्रेम आजादी देता है गुलामी कदापि नही। जीवन में जब भी घुटन जान पड़े तो समझो किसी वस्तु,आदत,स्थान,व्यवस्था या व्यक्ति की गुलामी में हो। जब सारा खुला आकाश,धरती व छितिज उड़ने,कुलाचे भरने, खुली वायु में स्वास लेने को तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो तो समझ जाओ तुम प्रेम में हो।
पारूल 🙂

Monday, September 4, 2017

वो ये इश़्क़ ही है


दिन के जाते जाते 
बेचारे सूरज की मटकी 
फूट ही गई 
उतरते उतरते शाम की सीढ़ियाँ।
बादलों ने दोनों हाथों से 
समेटा तो बहुत आंचल में 
सूरज का पिघला सोना।
और लपेट लिपटा कर 
सूरज को किया विदा।
बादल तो डबल ड्यूटी
पर हैं आज।
रात भर बरसेंगे।
हाथ पैर झाड़ कर
जब बादल चले 
वापस अपनी-अपनी
पॉजिशन लेने।
 नाज़ुक सी बूँद सोने की।
झूम के चूम रही थी एक सांवरे से
बादल की पेशानी बार बार।
लिपटी रह गई थी बादल की लट में वो।
बादल हैरान बोला," पगली
गई क्यूँ नही। हम तो बरस रहेंगे
कुछ लम्हों में।
तो अकेली आसमान में कैसे टिकी रहेगी?"
"तो चलो मुझे भी साथ लेकर धरती पर।"
बूँद ने इठला कर कहा।
"बावली, यूँ नही जाता कोई आसमान से धरती पर
पिघल जाना पड़ता है।
नाम,तासीर सब बदल जाता है ।
रात में तो सूरज की रोशनी भी चाँदनी
बन कर बिखरती है ।
चाँद की सारी चाहत ओस बनकर
चूमती है हर ज़र्रे को।"
तो मुझे बादल बना लो मैं भी तुम्हारे
साथ बरसूंगी।
उसके लिए तो पहले मुझे जलना होगा
तुम्हारी आग में।"
"नही नही मैं ये ना कर सकूंगी
प्यार है दुश्मनी नही।"
"बावली,प्यार का निभाना इश़्क़ है।
एक हो जाना इश़्क़ है।
मैं का मिटाना इश़्क़ है।
बूँद का ताप और बादल
पिघल कर  बने पानी
और चल दिया ये इश़्क़ गाता
मुस्कुराता धरती की और।
चाँदनी रात में देखा है कभी
हँसती,इठलाती,जल्दबाज।
जो पहली बूँदें झमाझम
आकर चूमती हैं धरती को
वो ये इश़्क़ ही है।
वो ये इश़्क़ ही है ।
पारूल सिंह




 


सतरंगी छ़ाता


 आज मुझे अपने facebook पेज के लिए एक पोस्ट लिखनी थी मैं कल से ही लिखने में लेट हो जा रही थी कभी किसी वजह से कभी किसी वजह से कई बार टॉपिक को लेकर ही कंफ्यूज थी खैर लिखने बैठी तो   आदतन अपने कमरे की बालकनी से बाहर हो रही बारिश देखने लगी तभी मेरे सामने वाली बिल्डिंग की एक बालकनी में एक लड़की निकल कर आई। उसने दो तीन बार ऊपर आसमान को देखा और फिर दोनो हाथ आगे बालकनी से बाहर निकाल दिये शायद बारिश को महसूस कर रही थी। फिर झट से अंदर गई और रेनबो के सात रंगों का एक छाता लेकर आई।और छाते को ओढ़ ले कभी हटा दे,फिर थोड़ी देर भीगे फिर छाता सर पर तान ले कभी छाता रख दे और अपने बालों को लहरा कर बालकनी में घूमे तो कभी उछल उछल कर छपाक करे। मेरे चेहरे पर बरबस ही मुस्कान आ रही थी और मैं सब भूल कर उसे बारिश का लुत्फ उठाते देख रही थी। फिर उसने छाते को बालकनी से बाहर फैला दिया,हवा तेज थी,छाती पलट़ गया।जैसा की हम सब ने महसूस किया होगा ये तजुर्बा मुझे लगा अब ये छाता रख देगी,पर नही,उसने तो छाते को दोनो हाथों से फिरकी की तरह घुमाना शुरू कर दिया । छाता बहुत सुन्दर लग रहा था, छाते की सारी डंडिया सात रंगों के हाथ ऊपर उठाए गोल-गोल घूम कर नाच रही थी जैसे। घुमाते-घुमाते वो था तो को अपने सर पर ले गई हवा का दबाव दूसरी तरफ बना और छाया सीधा हो गया। लड़की को क्या करना है ये उसकी समझ में आ गया था। अब तो वो बार-बार छाते को बालकनी से बाहर निकाले,छाता पलट जाए।छाता पलटे तो उसे सर पर ले जाकर घुमाए, छाता फिर सीधा हो जाए। फिरकी की तरफ घूमना घुमाना चलता रहा उस लडकी,महिला या औरत का।वो काफी दूर थी तो ये मालूम होना मुश्किल था। और इस से कोई फर्क भी नही पड़ता कि वह किस उम्र की थी। फर्क पड़ता था तो इस बात से कि उसने अपने सतरंगी छाते को खुशी खुशी घुमा कर रख छोड़ा था। छाता उल्टा हो या सीधा। उसे दोनों हालात में छाता को घुमाने में आनंद आ रहा था। बल्कि इस छाते के खेल में उसे ज्यादा मजा तब आना शुरू हुआ जब छाता पलट कर उल्टा हो गया था। उस के बाद तो उसने छाते को फिरकी बना दिया। इसे कोई परवाह ही नही थी कि बाकी की दो हजार बाल्कनियों से कोई उसे देख रहा था या नही।  वो तो बस मग्न थी। वो उसका छाता और बारिश।मैनें देखा और किसी भी बालकनी में कोई नही था। क्या दो हजार लोगों में किसी के पास भी सतरंगी छाता नही था? है दोस्तों उन दो हजार के पास भी है और हम सब के पास भी है । हमारी ये ज़िन्दगी सतरंगी छाता ही तो है। बारिश इस छाते की उमर है। छाते का सीधा रहना इस ज़िन्दगी के सुख और उल्टा होना दुख। फिर हम क्यूँ नही घुमा घुमा कर मजे लेते इस ज़िन्दगी के? दुख हो के सुख ज़िन्दगी को फिरकी बना कर क्यूँ नही मजा लेते इसका? दोस्तों समझ रहें हैं ना! मजा फिरकी घुमाने में है। छाता उल्टा हो के सीधा। बल्कि छाता उल्टा हो यानि दुख में जब छाते को घुमाते है तो उसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है। 

Monday, August 28, 2017

इसे कोई प्रॉब्लम है

इसे कोई प्रॉब्लम है

जब भी थाम के हाथ उसका जाती हूँ कंही
कई बार मुझसे पूछते है लोग, “इसे कोई प्रॉब्लम है “ ..
मैं जब भी रसोई मे खाना बनाती हूँ,
उस से छुप कर रसोई मे जाती हूँ |
वो पर आ ही जाती है वंहा पर,
मुझे घर में कंही और ना पाकर,
और लग जाती है, अपने नन्हे हाथों से रोटी बेलने |
 मुझसे पूछती है, ''माम् आप क्या कर रही हैं ?''
“खाना बना रही हूँ बेटा “
“मेरे लिए खाना बना रही है, थैंक यू माम्
बहुत अच्छा बना रही हो थैंक यू | “

खाते हुए  हर कौर के साथ
खाना बहुत अच्छा  बना है, वो मुझे ये बतलाती है |
मैंने कितने सालों खाना बनाया,
कभी ही घर मे कोई तारीफ करता हो |
कभी ही कोई समझता  हो,
कि मैंने ये खाना उनके लिए बनाया है |
कोई ड्यूटी नहीं निभायी |
पर वो मुझे अहसास कराती है,
कि उसे अहसास है, और वो शुक्रगुजार  है,
कि मैंने उसके लिए खाना बनाया |
ये अहसास होना, और मुझे भी ये अहसास करवाना,
कि वो समझती है मैंने ये उसके लिए किया है,
अगर प्रॉब्लम है,
तो होगी उसे कोई प्रॉब्लम |

घर मे किसी बीमार का होना तो बड़ी बात,
कोई आह भी करे तो वो दौड़ के पूछती है,
“की होया ?
तबियत सही नहीं है ?
बुखार है ? मै सर दबा दूँ ? “
और जब तक कोई हाँ ना का जवाब दे |
वो सर दबाना शुरू कर देती है |
वो दौड़ कर, अपना डॉक्टर प्ले सेट ले आती है |
और जाँच शुरू करती है |

 ये केयर प्रॉब्लम है ?
तो होगी उसे कोई प्रॉब्लम |

 किसी को रोते देखना तो दूर की बात,
 वो जरा सा रोने का मुहँ बनाने पर ही,
 अपने खिलोने देने को तैयार हो जाती है |
 वो किसी को डांट रही है,
 तो उसका उदास चेहरा देख कर,
खुद सॉरी बोलती है |
कोई उसे मारे या डांटे,
तो उसे पलट कर वो नहीं डांटने देती,
कि कंही उसे बुरा न लगे |
ये दिमाग के बजाये,
दिल से सोचना प्रॉब्लम है ?

तो होगी उसे कोई प्रॉब्लम |
पर आजकल माँ बाप की लाख कोशिशों पर भी,
बच्चे उन की नहीं सुनते |
महंगे से महंगे गिफ्ट भी,
उन्हें खुश नहीं करते |
प्यार कंहा  का ?
माँ बाप की भावनाए नहीं समझते बच्चे |
माँ बाप शादी के बाद बेटे, बहु को
मिलने वाली जायदाद में रूकावट के सिवा
और कुछ नहीं लगते |
उन्हें कोई प्रॉब्लम नहीं है?
अगर है तो, फिर इसकी प्रॉब्लम
उनसे  बहुत अच्छी है |
 मुझे ख़ुशी है कि,
 इसे कोई प्रॉब्लम है |
पारूल सिंह

Thursday, August 24, 2017

प्लेसिबो इफेक्ट

Placebo effect:
Placebo effect मूलतः एक प्रकार की झूठी दवाई से ईलाज करना है। मान लें कि एक मरीज को डॉक्टर कुछ शुगर टेब्लेटस दे दें ये कह कर कि इस से उसका बुखार उतर जाएगा,या कोई और बीमारी हो तो वो ठीक हो जाएगी। और उस दवाई को असली दवाई मान कर मरीज ले ले और वह ठीक हो जाता है। इसे प्लेसिबो ईफेक्ट कहते हैं।
प्लेसिबो इफेक्ट जाने या अनजाने रूप से किसी भी स्थिति को सच मान लेने से उसका सच में सच हो जाना है।
रिसर्चस से पता चला है कि कई बार कुछ अॉपरेशनस,सर्ज़री में भी प्लेसिबो ईफेक्ट के पॉजिटिव रिज्लटस मिले हैं। जैसे किसे व्यक्ति को केवल चीरा दे कर टांके लगा दिये जाएं और उसे कह दें कि आपके अमुक अंग की सर्जरी कर दी गई है। व मरीज को उस सर्जरी से वो ही रिजल्ट मिल जाते हैं जो उसे असली सर्जरी से मिलने वाले थे।
बेसिक्ली ये व्यक्ति के दिमाग व शरीर के सम्बन्ध पर निर्भर है। ये मुख्यतः निम्न रोगों में कारगार है।
दर्द
डिप्रेशन
अनिद्रा
एनजाइटी
कईं बार मरीज को पता होते हुए भी ये प्लेसिबो पद्धति कार्य करती है। यह मुख्यतः उम्मीद पर निर्भर है जिस व्यक्ति को आसानी से उम्मीद व विश्वास करने की आदत हो उन पर ही यह ज्यादा कारगार होती है।
मेडिसिन प्रैक्टिस में इसे मान्यता नही है,क्योंकि मानना है कि यह डॉक्टर व मरीज के विश्वासी सम्बन्ध के लिए सही नही है।
कईं बार प्लेसिबो के कार्य करने का एक पहलू यह भी है कि जिस दवाई के स्थान पर यह दी जाती है उससे होने वाले साइड इफेक्टस भी मरीज मे पाए जाते हैं।
प्लेसिबो की तरह ही नोसिबो प्रभाव भी होता है।
प्लेसिबो व नोसिबो इफेक्टस को अब सेल्फ हेल्प व सॉइक्लजी में भी प्रयोग किया जाने लगा है।
जैसे यदि हम मान लें व महसूस करने लगे कि कोई कार्य विशेष हम कर सकते हैं तो अपनी फिजिक्ल लिमिटेशंस के होते हुए भी हम वो कार्य कर पाते हैं।
मरीज स्वयं यह विचार करे कि वो ठीक हो रहा है तो वो ठीक हो जाता है।
अपनी ज़िन्दगी में भी अगर हम ये मान लें कि चाहे जो हो मैं तो खुश रहूंगा परेशानियां मुझे परेशान नही कर सकती तो ऐसा ही होने लगता है धीरे धीरे।
पारूल

Monday, August 21, 2017

ये पास वाले मोड़ से पहले सड़क किनारे 
चुपचाप ठुंठ खडे पेड़ के अन्तर्मन में 
बड़ी चहल पहल है आजकल।
चुपचाप इसलिए क्योंकि शोर मचाने को 
उसके पास कुछ नहीं 
ना टहनी ना पत्ते
वरना पेड़ कभी चुप नहीं रहते 
हवा के साथ जबरदस्त रोमांस 
चलता है उन का।

हवा के इशारों पर झूम कर
नाच-नाच कर
झूनन-झूनन की आवाजें करना 
और टहनियां फैला-फैला कर 
पत्तियों को झटकना।
हवा कम हो के ज्यादा 
दिन में जागते और 
रात को सोते हुए 
ये ही काम उनका।

झूनन-झूनन झूनन

सड़क किनारे के पेड़ों को 
एक और सुविधा रहती है 
ना हो हवा तो आते जाते वाहन 
उन्हें कान पकड़ इधर से उधर तक 
खींचें चले जाते हैं 
अपनी गति की हवा से 
झूनन-झूनन झूनन

हाँ तो उस चुपचाप खड़े पेड़ के 
अन्तर्मन में बड़ी चहल पहल है 

पास के जल संस्थान का पानी 
जब ओवर फ्लो होता तो नाले से
सड़क पर फैल जाता 
ना नाले का पानी कम था, ना बरसात का।

जाने किस की नज़र लगी थी कभी उसे
और अब ना जाने कौन गली की हवा 
किस तरह उसका शरीर छू गई कि 

उस ठूंठ पेड़ के सीधे सपाट तनों में 
कुछ कौंपले फूटने लगी हैं 
इधर उधर फैलीं गिनती भर की 
शाखाओं में भी कहीं-कहीं 
गोल-गोल गांठो को हरी-हरी
नौकों से फोड़,कुछ कौंपले
झांकने लगी हैं।
आँखें झपका-झपका  उचक कर
विस्मित सी देख रही हैं 
नई दुनिया को 

बड़ी सुगबुगाहट है पेड़ के अन्दर 
वो कुछ और तन कर खड़ा हो गया है।
अब तक तो 
यहाँ खड़े-खड़े अनमना,भावहीन 
आते जातो को देखता था वो 
आखों से ही उन्हें 
सड़क के एक किनारे से दूसरे तक छोड़ता,
ऊंघता रहता 
अपने हालातों से समझौता कर चुका था 
पर इन हरी कौंपलों ने तो
उसके दिन फेर दिये।
वो अब अपने आसपास के 
उन पेड़ों में जो शामिल होने जा रहा है 
जो अपनी पत्तियों और टहनियों को
हवा में लहरा कर झूमते हैं 
झूनन-झूनन झूनन


जिन्हें देख कर उसके मन में कोई भाव ही 
ना आते थे 
बस वो अपने ही खोल में ऊंघता रहता था 
पर अब वो भी उनके जैसा 
फलों-फूलों टाईप होने जा रहा है 
तो इस फलने-फूलने के भाव को
समझ पा रहा है।
ये भाव उसे आनन्दित कर रहे हैं
उसके भी झूमने के दिन आने वाले हैं 
झूनन-झूनन झूनन
वो पूरे जोग से अपनी कौंपले समेटे
अभी से झूम रहा है 
झूनन-झूनन झूनन
पारूल

Tuesday, July 25, 2017

#आजादीबनामआराम1 देक्खो आजादी चाहने वाली बहनों आजादी तो मर्दो को भी चाहिए, सुबह काम पर  जाना और शाम को लौटना फिर घर बाहर के भी सौ काम। यानि के आजादी तो उनके पास भी नही,तो जो खुद आजाद नही वो तुम्हें क्या आजादी देगा? सो ये तो क्लियर हुआ कि आजादी उससे नही माँगनी। दूसरी बात आजादी फ्री नही मिलती इस दुनिया में कुछ भी फ्री नही। कुछ तो दांव पर लगाना होगा। और चलो तुमने कुछ दांव पर लगा भी दिया और ना आजादी मिली ना वो वापस मिला जो दांव पर लगाया था तो? माया मिली ना राम बनाओगी क्या अपनी ज़िन्दगी को? पहले बेस तैयार करो। अपने कम्फर्ट जॉन से निकलना होगा। अपने फैसले खुद लोगी तो परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा। सो तन मन और बहुत खास चीज धन से तैयार होकर ही कदम उठाना चाहिये।
बहुत आसान है विक्टम बन कर रहना।बहुत आसान है कहना ये करने नही देते,ये मना करते हैं,सास इजाजत नही देती,ये सब कह कर विक्टम बन लो बेचारी बन लो और घर रसोई निपटा कर खरांटे मार के सो जाओ। के जी हमारे साथ जो हुआ वो हमने तो किया ही नही।हम बेचारी।
कहीं ऐसा तो नही के सास नौकरी पर जाने की इजाजत दे दे और तुम सुबह से शाम अॉफिस और घर के काम कर याद करो कि 11 बजे काम निपटा कर 2 घंटे की नींद भी ले लेती थी,ये क्या झगड़ा मोल ले लिया।
सो पहले बैठो,सोचो ठंड़े दिमाग से कि क्या तुम्हें सचमुच कोई आजादी चाहिए भी। या जो है जैसे है सब तुम्हारे मन मुताबिक है।
तुम वो एक्सट्रा एफर्ट कर के कुछ एक्सट्रा पानी भी चाहती हो या नही।
ये ही बात समाज के स्तर पर अधिकार, हक नारी विमर्श,स्त्री विमर्श पर लागू है। जो समाज खुद चार लोगों से डरा रहता है जिसका मूल वाक्य और डर  ही ,"लोग क्या कहेंगे" है। वो तुम्हें क्या हक देगा। मांगना नही हक को ओढ़ना पहनना होगा...... क्रमशः
बाकी कल। मेरा भी डिनर का वक्त हो गया।  ग्यान बाँटने के अलावा घर के काम भी करने होते है मुझे :-)
पारूल सिंह

Tuesday, April 5, 2016

इतना रहे ख्याल .....


स्त्री विमर्श दो स्तरों पर सामने आता है। एक सामाजिक स्तर पर व दूसरा पारिवारिक स्तर पर । दोनों ही स्तरों पर अपनी-अपनी तरह से काफी आंदोलन हुए हैं तथा चल रहे हैं । सामाजिक स्तर पर जंहा स्त्री के राजनैतिक,व्यवसायिक व समाज से जुड़ें हक़ों के मुद्दे हैं। तो पारिवारिक स्तर पर घर में उसका स्थान व् उसके साथ किया जा रहा व्यवहार महत्वपूर्ण है। अगर हम पारिवारिक स्तर पर बात करें तो आखिर इस पूरे प्रकरण में अपने हक़ों तथा किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार के लिए भय या असुरक्षा हमें पुरुष के ही किसी रूप से है। 

यह एक मूक व सतत आंदोलन भी रहा है । हमारे पास आज बहुत सारे अधिकार हैं । जो हमें पिछली आंदोलनरत पीढ़ियों की मुखरता ने प्रदान किये हैं। ये रातों रात होने वाला परिवर्तन नहीं है । हम आज अपनी आवाज़ मुखर करते हैं तो हमें सकारात्मक परिवर्तन मिलने में समय लगेगा । हम उसका फायदा कम या बिलकुल न उठा पाएं ऐसा हो सकता है किन्तु आने वाली पीढ़ियां उस परिवर्तन से जरूर लाभान्वित होती हैं। 
ये सही है की हर नयी पीढ़ी के लिए आज़ादी के मायने बदल जाते हैं। पर ये भी सही है कि अपनी हद और जद अब हमें खुद ही निर्धारित करनी होंगी । अपने अधिकारों का उपभोग करते हुए अब हमे थोड़ी चतुरता से काम लेना होगा। 

किसी भी समाज में आने वाला परिवर्तन उसके प्राणियों की सोच पर निर्भर करता है और उनकी सोच को प्रभावित करने वाले दो कारक धर्म व दर्शन हैं ।  धर्म व् दर्शन को बदलना तो संभव नहीं पर धर्म व् दर्शन की शिक्षा को देशकाल व आज की आवश्यकता अनुरुप ग्रहण करने का, समझने का, परिवर्तन यदि आ जाये तो काफी हद तक स्त्री के प्रति समाज व परिवार के नजरिये को बदला जा सकता है। 

ये हम महिलाओं पर भी निर्भर करता है कि हम जो हमे मिला है उसका सदुपयोग करें और जो चाहिये उसके लिए सजग रहें । ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा समाज रच सकें जिसकी सोच प्रारंभिक स्तर से ही भिन्न हो । 

यह परिवर्तन परिवार के स्तर से शुरू कर दिया जाये तो आशा की जा सकती है कि फल सकारात्मक होगा । हमारे यंहा परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी माँ पर होती है । यदि हर माँ अपने बच्चे को शुरू से ही स्त्रिओं का आदर करना सिखाए व परिवार के बच्चों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव न करे तथा न उसे बढ़ावा दे तो निश्चय ही आने वाली पीढ़ी एक जागरुक व समानता के हामी नागरिकों की स्वतः ही होगी । 

ये चतुराई हम महिलाओं को ही अब करनी होगी । अपने परिवार में तो हम इसके सकारात्मक परिवर्तन पाएंगे ही अपितु समाज पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा |
ये सही है कि ये कहना जितना आसान है करना उतना सरल नहीं है क्योंकि एक स्त्री पर एक तो बहुत सारे सामाजिक दबाव होते हैं, सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी परम्पराएं भी हैं। जो उसे खुद को खुद की बनाई बेड़ियों में जकड़ने का काम करती हैं । जिससे कंई  बार वह स्वयं अपनी ही जाति के विरुद्ध होती है । 

किन्तु फिर भी ये प्रयास धीरे-धीरे ही सही कम-कम ही सही एक बड़ा परिवर्तन लान में सफल होगा । घड़ा बूंद-बूंद से ही भरता है। 
स्त्री को अब जरुरत अपने हक़ों को चिल्ला कर मांगने की ही नहीं उसे खुद के स्तर पर परिवर्तन लाने की भी है। न तो यह वक़्त अपने हक़ों के लिए सजग ना रहने का है ना सिर्फ़ और सिर्फ़ चिल्लाने का । 
हमे अपनी निरंतरता और तटस्थता कायम रखनी है, ये नहीं कि किसी भी पारिवारिक बहस के दौरान हमें सारा स्त्री-विमर्श याद आ जाये और दूसरे ही पल हम अपनी इच्छा से त्याग की मूर्ति,पाँव की जुती बन स्वयं को कृतार्थ मानें । मौके हम स्वयं भी  देते हैं । गलत को गलत हर हाल में कहना ही होगा। उसे प्यार या फ़र्ज़ का नाम देकर सही सिद्ध करने की आदत हमें भी छोड़नी होगी । 
                                                                                                                                                                               पारुल सिंह  
-- 
parul singh

Tuesday, February 16, 2016

किताब "101 किताबें गजलों की " लेखक : नीरज गोस्वामी


अभी कुछ दिनों पहले रेख्ता के प्रोग्राम जश्न ए रेख्ता में जावेद अख्तर जी को उर्दू,लेखन,ग़ज़ल आदि पर विस्तार से सुनने का मौका मिला। उन्होंने एक बात बहुत अच्छी कही कि अपना एक शेर कहने से पहले आपको ज्यादा नहीं तो कम से कम पांच सौं शेर तो औरों के याद हों।

शायरी ही क्यूँ ये बात लेखन की हर विधा पर लागू होती है। किताबें आपकी सोच को नये आयाम देती हैं आपके दृष्टिकोण के दायरे को बढ़ाती हैं। शायरी पढ़ने और लिखने वालों के लिए "101 किताबें गजलों की" ऐसी ही एक किताब है।

सुविख्यात शायर नीरज गोस्वामी जी की लिखी इस किताब में उन्होंने नए व पुराने 101 शायरों की किताबों को सम्मलित किया है । इन किताबों व इन के शायरों पर नीरज जी ने खुल कर चर्चा की है।

इस किताब में एक जगह नीरज जी लिखते हैं,"किताबें हमें हमेशा कुछ न कुछ देती हैं बिना बदले में हम से कुछ भी लिए ..... इसलिए मैं हमेशा आग्रह करता हूँ के अपनी दुनिया में किताबों को जगह दो। 

जिनको आपने अब तक जगह दे रखी है उन्हे वंही रहने दो लेकिन किताबों के लिए भी थोड़ी सी जगह बना लो। आज माना आप बहुत व्यस्त हैं आपके ढेर मित्र हैं,नाते, रिश्तेदार है, ज़िम्मेदारियाँ हैं , सामने बड़े बड़े टार्गेट हैं, पैसा कमाने की होड़ है लेकिन ये स्थिति हमेशा नही रहेगी।

 एक दिन आप तन्हा होंगे एक दम तन्हा..... इतने तन्हा के सन्नाटा बोला करेगा और आप उसे सुन कर डरेंगे तब आपको किताबें सहारा देंगी। सन्नाटों को संगीत के सातों सुरों से भर देंगी। सूखे पेड़ों पर हरी पत्तियाँ ले आएगी । उन पर फिर से फूल खिला देंगी।"

खास बात ये है कि इस किताब में जिन शायरों की किताबों का जिक़्र किया गया है उन में से ज्यादातर बहुत प्रसिद्द नाम नहीं हैं । पर इस से उनकी शायरी को कमतर ना आँका जाये । बल्कि सभी शायरों की शायरी हैरान करने वाली है,पढ़ कर अहसास होता है कि साहित्य सेवा करने वाले बहुत से लोग इस बात की चिंता नहीं करते कि उनका नाम हो रहा है अथवा नहीं । वो तो बस पूरी निष्ठा से कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर रहते हैं और कुछ के लिये ये स्वात सु:खाय है तो भी उनकी शायरी स्वयं बताती है कि वे किस पाए के शायर हैं। 

इस किताब में नीरज जी कहते हैं कि,"दोस्तों देश में न जाने कितने शायर हैं और न जाने शायरी की कितनी किताबें छपती हैं । हमें सिर्फ उन्ही किताबों का पता चल पाता है जिन्हें नामचीन प्रकाशक छापते हैं या फिर जिनकी चर्चा अख़बार या मैगजीन में होती है । बहुत कम ऐसा होता है कि आपको एक अपरिचित प्रकाशक की कोई ऐसी किताब मिले जिसमें चौंका देने वाले शेरो की भरमार हो और जिसे लिखा भी किसी नामवर शायर ने ना हो । मेरा नाम आप ऐसे ही खुशकिस्मत पाठकों में आप दर्ज़ कर सकते हैं जिसके पास शायरी की एक ऐसी ही अनूठी किताब है। "

एक और जगह नीरज जी कहते हैं कि "मुझे अनजान शायरों को पढ़ने में पड़ा मज़ा आता है क्यूंकि आप नहीं जानते कि कैसे हैं, कैसा लिखते है,क्या सोचते हैं याने आपके मन में उनकी कोई पूर्व छवि बनी नहीं होती । आप उन्हें निष्पक्ष होकर पढ़ते हैं इसी में मज़ा आता है ।"
"101 किताबें गजलों की" में लेखक ने संकलित किताबों के शायरों के साहित्यिक व व्यक्तिगत जीवन के विषय में भी ऱोचक जानकारियाँ दी हैं । 
ये किताब आपको ख़ोज,रूपये व पढ़ने में लगने वाले समय जैसे जोखिमों से बचाते हुए ऐसी किताबों से रूबरू होने का अवसर प्रदान कराती है जिन्हें आप बार बार पढ़ना चाहेंगे । 

आप अपनी पसंद की किताबें छांट कर मँगवा सकते हैं । किताबो के प्रकाशकों व ज्यादातर शायरों के फ़ोन नंबर व पते की जानकारी व किताब प्राप्ति के तरीक़े भी नीरज जी ने अपनी इस किताब में दिए हैं । आप किताब के बारे में पढ़ कर शायर स्वयं को दाद देना चाहें तो फ़ोन कर दे सकते हैं । 

शायरी प्रेमियों के पास शायरी से सम्बंधित ये क़िताब आवश्यक व संग्रहणीय है । इसमें शायरी पर  किताबों के शायरों के निजी विचार, किताबों की भूमिका में उल्लेखित गुणीजनों के उद्गार व नीरज जी के निजी विचार भी आपको पढ़ने को मिलते हैं ।  101 किताबें गजलों की के प्रकाशक शिवना प्रकाशन सिहोर मध्य प्रदेश हैं । 
"101 किताबें गजलों की" को प्राप्त करने के निम्नलिखित तरीक़े हैं......  

1. आप नीरज जी को उनके मोबाइल नंबर 9860211911 पर फ़ोन कर उन से किताब भेजने का आग्रह कर सकते हैं ।  ऐसा आप उन्हें उनके ई -मेल आई डी  neeraj1950@gmail.com पर मेल कर भी कर सकते हैं । आप फेसबुक पर भी नीरज जी से संपर्क कर सकते हैं -- https://www.facebook.com/neeraj.goswamy.16

2 शिवना प्रकाशन से फेसबुक फ़ोन व डाक पर संपर्क कर भी यह किताब मंगवायी जा सकती है । 

  शिवना प्रकाशन 
                   पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेंट 
                    बस स्टैंड , सीहोर - 466001 (म. प्र.)
                     फ़ोन : 07562 - 405545, 0762 - 695918 
                     E-mail: shivna.prakashan@gmail.com 

https://www.facebook.com/shivna.prakashan?pnref=friends.search

3  शिवना प्रकाशन से प्रकाशित नीरज गोस्‍वामी की पुस्‍तक चर्चा पर विशेष पुस्‍तक 101 किताबें ग़ज़लों की अब दो अन्‍य प्रमुख ऑनलाइन स्‍टोर्स पर भी उपलब्‍ध है। 
https://paytm.com/…/101-kitaben-ghazlon-ki-9789381520277_11…
http://www.flipkart.com/item/9789381520277

                                                                                                               पारुल सिंह 

Thursday, January 21, 2016

अकाल में उत्सव : अद्वितीय कृति



मैं कोई आलोचक या समीक्षक कतई नहीं हूँ। ना ही इन दोनों के लिए स्वयं को समर्थ मानती हूँ ।
 किन्तु तीन चार दिन पहले पंकज सुबीर जी का उपन्यास "अकाल  में उत्सव " पढ़ा तो, ह्रदय को झंकझोर गया। अभी तक दो बार पढ़ चुकी हूँ । 
 कोशिश करने पर भी उसके पात्र उतर नहीं रहे दिलो-दिमाग़ से । अतः केवल एक पाठक के तौर उपन्यास पढ़ने के अपने अनुभव लिख रही हूँ । 
 हिंदुस्तान में छोटे किसान की दयनीय स्थिति व प्रशासनिक व्यवस्था के झोल तथा भ्र्ष्टाचार पर उपन्यास खुल कर रोशनी डालता है । 
पर कथा शिल्प के दायरे में रहते हुए। कंही भी भाषा ना तो बहुत ज्यादा वर्णात्मक होती है ना बोझिल । दो भिन्न परिवेशों पर चलती कहानी जो आपस में जुडी हुई भी है, कंही भी नीरस नहीं होती । 
देशकाल अनुरूप कहन की कसावट पर खरी उतरती उपन्यास की कहानी मे कुछ भी अनावश्यक नहीं है । 
उपन्यास उस अनाज के जैसा है जिसकी छान - पटक अच्छे से की गयी हो । लगता है लेखक ने अपने लिखे हर  वाक्य को अपनी कसौटी पर कस कर, संतुष्ट  होकर ही कथा को आगे बढ़ाया है । 
किसी प्रकार की जल्दबाजी या लापरवाही मे लेखक नहीं दिखता । 
उपन्यास के पात्र आंचलिक भाषा ,बोली, कहावतों का ही प्रयोग करते हैं। जिससे उपन्यास में आने वाले घटनाक्रमों का चित्रण इतना सजीव बन पड़ा है कि पढ़ते पढ़ते पाठक उन दृश्यों को देखने लगता है । 
रामप्रसाद व कमला ( इनकी दरिद्रता का वर्णन इतना मार्मिक  है कि इन्हे नायक ,नायिका भी नहीं कहा जा रहा । ) जब भी एक साथ आते हैं तो , हर दृश्य आँखों के कौरों को भीगो जाता है ।
इस दम्पति के जीवन की मार्मिकता में छुपे प्रेम का जैसा वर्णन लेखक ने किया है , वो दुर्लभ है । 
आंचलिक भाषा के शब्द कहानी में बहुत सहजता से आते हैं, कंही भी वो जबरदस्ती ढूंसे नहीं गए हैं । भाषा शैली का चातुर्य स्पष्ट झलकता है । 
दोनो परिवेशों मे घटित घटनाओं का वर्णन निरा काल्पनिक नही लगता। लेखक ने आँकड़ो के साथ बहुत सरल भाषा मे अपनी बात रखी है, जिससे पाठक को ज़रा भी परेशानी नही होती तथ्यों को समझने में।
जीती- जागती रसीली भाषा के साथ जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उतना ही पाठक उस मे डूबता जाता है। भाषा की एक ख़ासियत यह भी है कि वह क्लिष्ठ नही है। भारी - भरकम शब्दों का प्रयोग होने से कथा अपने देशकाल से तारत्म्य में नही रहती, लेकिन इस उपन्यास के जो पात्र जिस परिवेश से है वो वंही की आम बोल-चाल की भाषा तरीक़े व लहजे का इस्तेमाल करते हैं।
अपनी पत्नी के गहने बेचने के दृश्य में गहने के पिघलने व रामप्रसाद के मन मे चल रहे मंथन का दृश्य पाठक के ह्रदय को अंतरकोश तक झकझोरता है। 
एक बात तो निश्चित है लेखक ने ये उपन्यास केवल लिखने के लिए नही लिखा है। अवश्य ही इसके विषय से लेखक स्वयं भी आंदोलित रहा है। एक ज़िम्मेदार लेखक होने के नाते लेखक सामाजिक सरोकार रखता है,और उपन्यास लिख उसने अपने सामाजिक व लेखकीय दायित्व का निर्वहन किया है। 
लेखक ने अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी तन्मन्यता से निभाई है जिसमें वह सफल भी हुआ है। पाठक पूरी तरह से लेखक से जुड़ कर, घटनाक्रमों मे डूब कर लेखक के रचे संसार मे अनवरत विचरता है। 
लेखक बहुत प्रवीणता के साथ जंहा भारतीय किसान की दयनीय दशा का वर्णन करता है, उसी दक्षता के साथ वह हमारी प्रशासनिक व्यव्स्था की ख़ामियों पर भी रोशनी डालता है। 
प्रशासनिक कार्यो, दफ़्तरों जैसे नीरस विषय को भी लेखक ने अपने लेखकीय चातुर्य का प्रयोग कर, मुहावरों , कहावतों व भाषा की सहजता के साथ रोचक बना दिया है।
एक दृश्य --
" फागुन का महीना फ़सल के पकने के लिए ही होता है। हवा मे ऐसी खुनकी व मादकता आ जाती है कि फ़सल भी झूम कर पक जाती है।" ....
खुनकी जैसे शब्द का प्रयोग फागुन की महक पाठक तक पहुँचा देता है। 
यह तो महज़ एक वाक्य है ऐसे ही जीवंत दृश्य व शब्द पाठक को बाँधे रखते हैं। 
किस्सागौई का माहिर यूँ ही नही कहा जाता पंकज सुबीर को।
यह उपन्यास लिख लेखक ने तो अपने सामाजिक व नैतिक दायित्व को निभा दिया है। 
ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक यह पंहुचना चाहिए । 
विश्वविद्यालय के छात्रों के कोर्स मे रखने का अनुमोदन होना चाहिए। क्योंकि यह कृति हमारे देश के सबसे आवश्यक पर सब से ज़्यादा उपेक्षित व्यक्ति " किसान" के जीवन की कड़वी सच्चाइयों व कठिनाइयों से अवगत कराती है।
यह उपन्यास नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी की एक्टिंग सा है । तारीफ़ करनी है तो ले आओ शब्द कंहा से लाओगे
और कमियाँ ढूँढनी है तो ढूँढ कर बताओ। बस एक ही शब्द मे सब निहित है। वाह।
           🍀पारूल🍀

पुस्तक -- अकाल में उत्सव  
लेखक -- पंकज सुबीर 
प्रकाशक --  शिवना प्रकाशन 
                   पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेंट 
                    बस स्टैंड , सीहोर - 466001 (म. प्र.)
                     फ़ोन : 07562 - 405545, 0762 - 695918 
                     E-mail: shivna.prakashan@gmail.cm 



Thursday, November 26, 2015

"चाय"

 उन चुस्कियों की लज्ज़त कमाल थी ....
सवेरे सवेरे
हमारी बालकनी में 
ठंडी हवा 
झूमते मनी प्लांट 
झूलती बोगनवेलिया 
के इशारों पर 
जो उनके साथ ली जाती थी
सुबह की पहली l की 
उन चुस्कियों की लज्ज़त कमाल थी

जरा जरा जागे
जरा जरा नींद में वो 
ऊँघती मेरी जम्हाईयों से
लडती मेरी अँगड़ाईया 
आस पास के फ्लैट्स से घिरी
वो महफ़िल सी तन्हाईया 
दाल चीनी 
अदरख,तुलसी की महक 
साँसों में घुलती थी 
वो चाय की चुस्कियां बेमिसाल थी 

अब वो बनाए या मैं 
चाय मे वो खुश्बू ही नहीं आती 
चाय का स्वाद कसैला हो गया 
अब चाय पीयी जाती है
चुस्कियां नहीं ली जाती 
हालाकि हम तब भी चुप रह कर
चाय पीते थे, और अब भी
पर ये चाय बड़ी कमाल चीज है
इसका स्वाद दिल के
मिलने से आता है 
दिल में दरारे हों तो
इसका स्वाद भी दरक जाता है …….
                         🍀पारूल🍀

Saturday, November 14, 2015

नये हैं क्या ?

बेटी को लेकर एक बार गंगाराम हॉस्पिटल गयी थी | डाक्टर का कमरा खोजते हुए मैं गलती से पीडियाट्रिक कैंसर वार्ड में पहुँच गई | कोरीडोर के दोनों तरफ़ कमरे थे | हर कमरे में ६-८ बैड, हर बैड पर एक बच्चा | पास में एक माँ | गले में , नाक में नालियां लगे हुए बच्चे , बालों के बगैर बच्चे, नन्हें नन्हें, गोल मोल, दुबले-पतले बच्चें | बच्चों के साथ कुछ माएं भी बिना बालों के | एक दम गंजी माएं, कोई गोद में खिलाती | कोई गोद में लिए बैठी अपने बच्चे को |  ज़िद करते बच्चें हर ज़िद पर रोकती माएं | दौड़ने की ज़िद एक बच्चे के लिए कितनी छोटी होती है ये हर माँ का सपना होती है | दौड़ने की ज़िद पर रोकती माएं, रोते बच्चें | गुलगुली करती माएं, हँसते बच्चें | चूमते बच्चे निहाल होती माएं |
ये सब एक ही कमरे में नहीं था | क़दम-दर-क़दम बहुत धीरे चल रही थी मैं, पर एक भी बैड का हाल जाने बिना आगे नहीं बढ़ी | कुछ साफ़ दिख नहीं रहा था धुंधला, सफ़ेद सा था सब कुछ, आज तक भी स्मृति में ऐसा ही है | आँखों में आंसू भरे हुए थे | पर बदल दिया उस लम्हें ने मुझे, मेरी सोच को |
 कोई लम्हा अगर छू कर गुजर जाना चाहता है आपको तो छू लेने दीजिए उसे | गुजर जाने दीजिए उसे अपने जिस्म से रूह तक को छूते हुए | वो लम्हा जो अहसास देना चाहता है उसे महसूस होने दीजिए अपने जिस्म और रूह के हर रेशे को | बदल देने दीजिए उसे आपकी सोच, नज़रिए और जिंदगी को | कभी-कभी ख़ुद को ढीला एक दम हल्का छोड़ देना चाहिए ज़िंदगी के हाथों में | हवा से हल्का हो उड़ जाने के लिए, पत्ते सा सूखा हो बह जाने के लिए | ये ही वो पल होता है जो आपको आपके कुछ और नजदीक लाकर आप से मिलाता है | ये ही होता है वो लम्हा जो बहुत से पुराने सवालों का जवाब होता है | ये ही होता है वो लम्हा जो सोच के चोराहें पर खड़े रहने की पीड़ा से मुक्ति देता है | 
हम अपनी समझदारी, दुनियादारी, और लीक पर चलने के सदके ऐसे न जाने कितने पल आने,जाने देते हैं, अपनी ज़िंदगी में वरना नकारात्मकता से भरे दिल की लिए, सुबह के सैर पर काँटों में हँसते हुए एक फूल का इशारा ही काफी नहीं है क्या? पर नहीं ! हमें तो “तो क्या” कहने की आदत है |
चलिए ये ही सही | इस “तो क्या” को ही बोलना है तो बोलते हैं, बस जगह बदल लेते हैं थोड़ी सी |  
फूल काँटों में हंस रहा है तो क्या ये तो होता ही है उसे तो वैसा करना ही है, की जगह ये सोच लें ... ये नन्हा सा फूल काँटों में भी हंस रहा हैं, अपना रंग और खुश्बू भी नहीं छोड़ रहा | “तो क्या” मैं अच्छा भला इंसान जिसे भगवन ने इतनी नैमतों से नवाज़ा है | मैं क्या दर्द में मुस्कुरा नहीं सकता ? फूल की तरह काँटों में रहते हुए खुश्बू बाँटने की तरह मैं दुखी होते हुए भी ख़ुशी बाँट नहीं सकता ? 
“तो क्या” के कुछ और इस्तेमाल ...... मेरा घर छोटा है “तो क्या”, मेरा बच्चा स्पेशल है “तो क्या” ..... मुझे कोई दुःख है “तो क्या” ?
दुःख मनाने की आदत है | जिनके बच्चें नहीं हैं, वो कहते हैं कि हम दुखी हैं | जिनके हैं होकर बिगड़ गए वो कहते हैं हम सबसे बड़े दुखी हैं | जिनके होकर गुजर गए वो कहते हैं इस से बड़ा दुःख नहीं |
जिनके पास रुपया पैसा है वो दुखी, जिनके पास नहीं है वो दुखी | भाई मेरे अम्बानी से जाकर पूछो कोई न कोई परेशानी उसे भी होगी | सो दुःख नाम की कोई चीज नहीं होती, ये होता नहीं मनाया जाता है | जिन हालत पर अपना बस ही नहीं उन का दुःख क्या मनाना ?
हाँ तो उस दिन उस एक लम्हें ने बदल दिया मुझे | क्यूंकि मैंने महसूस होने दिया ख़ुद को वो सब | न वक़्त की परवाह की न सोच की | वो आंसू मेरे आख़िरी आंसू थे अपने बच्चे के स्पेशल चाइल्ड होने पर | वो बच्चें जो उस वक़्त अपनी सब से कम क्षमताओं और उर्जाओं में थे मुझे ऊर्जा दे रहे थे | वो मेरा सबल बन रहे थे | मेरी उंगली पकड़ लेकर चल दिए थे मुझे | जैसे कह रहे हों ,” आंटी चांदनी को ये तकलीफ तो नहीं झेलनी पड़ रही ना” | ,” आंटी मुझे बालों में पिन लगाने का बड़ा शौक़ है, देखो तो मेरे बाल चले गए, पर आप चांदनी को पिन लगाया करोगे ना | उसकी चोटियाँ गूंथा करोगे ना ?”
मुझे नहीं मालूम उन में से कितने बच्चें ठीक होकर घर वापस गए | मेरे लिए वो सारे ठीक होकर घर चले गए | पर जिस उम्र में हम एक इंजेक्शन तक से डरते थे, कीमोथेरेपी झेल- झेल कर अपनी उम्र से काफी आगे आ चुके वो बच्चें मेरे प्रेरणा-स्रोत हैं | हर दम मेरे साथ हैं | कभी एक-दो बार क़दम डगमगाये शुरू में तो उन्होंने मुझे उंगली पकड़ कर उसी कोरिडोर में घुमा दिया | अब तो खैर ये नौबत नहीं आती | 
अपनी ऊर्जा और प्रेरणा का स्रोत आपको ख़ुद खोजना होगा | ये बच्चे ही चाहिए तो गंगाराम जा सकते हैं | वरना तो ज़िंदगी बिखरी पड़ी है हर तरफ़ देखिये, सीखिए, उठिए और चलिए | आंसू तो रोकने होंगे अपने आख़िरी आंसू का कारण आपको ख़ुद खोजना होगा | कोई थाली में परोस कर नहीं देगा | और जब तक ख़ुद पर ये दया करोगे की कोई आये और हमे कारण दें, तब तक मिलेगा भी नहीं |
रोना बुरा नहीं है रो लो | खूब रोओ | जो जो बाते कह कर जिस जिस भगवन को जिस-जिस तरह से कोस कर रो सकते हो रो लो जी भर कर | इतना रो लो की फिर कभी आँख में आंसू न आयें | पर जिस दिन चुप हो जाओ उस दिन के बाद तुम से बहादुर कोई ना हो | 
माँ-बाप से ज्यादा बच्चे का भला कोई नहीं कर सकता, पर पहले स्वीकार कर लो कि ये हो गया हमारे बच्चे और हमारे साथ | ये ग़लत हुआ या सही इस पर बात बाद में | पर पहले मान लो कि अब हम बदली न जाने वाली एक स्थिति में हैं, जो समाज की सोच के हिसाब से दुःख है हमारे लिए नहीं | अब? अब क्या ?
जैसे कहते हैं ना कि कोई काम शुरू कर लिया तो मानिये की पचास प्रतिशत हो गया | वैसा ही यंहा भी है | आपने स्वीकार कर लिया तो आपको कोई नहीं रोक सकता अपने बच्चे के लिए अच्छे से अच्छा करने के लिए | रुकावटें तब तक ही हैं जब तक हम स्वीकार नहीं करते | सही भी तो है जब हम नहीं मानते की हमे कोई बीमारी है तो ना उसके लिए डॉक्टर खोजते ना दावा लेते | ये परिवार और समाज की शर्म हैं जो हमे ये स्वीकार करने से रोकती है | मानती हूँ जिस समाज में, जिस मानसिकता के साथ हम सालो-साल रहते आये हैं उसे रातो-रात बदलना मुश्किल है | पर ये तो ज़िंदगी के हर दुःख से जुडी सच्चाई है |
अगर घर में आग लगी है तो हम उसे छुपाते थोड़े हैं | बचाव के लिए पुकारते हैं | उस आग में हम बहुत सी चीजों से वंचित हो जाते हैं जो औरों के पास तो हैं | फिर भी हम ख़ुद को पुनः स्थापित करते हैं | ये ही यंहा भी करना है | आपको बस लोगो की सहानुभूति का पात्र बने रहना है या संभल कर ख़ुद को पुनर्स्थापित करना है, चुनाव आपका है | एक बात की गारंटी मुझ से ले लीजिये जब तक आप नहीं चाहेंगे आपके बच्चे और आप पर कोई दया नहीं दिखा सकता | हमारा व्यवहार ही लोगो का व्यवहार तय करता है | आप हौसले से भरे हैं तो लोग उल्टा आप से प्रेरित ही होंगे आप एक मिसाल बन उभरेंगे |
ये आपका एटीटूयड है अब जो जीवन भर आप और आपके बच्चे की खुशियां निर्धारित करेगा | पहली बात तो लोगो से हमे कोई दुश्मनी नहीं बांधनी है | क्या बुरा मानना उसका जो नादान है,अंजान है | कुछ वक़्त पहले तो आप भी उन में से एक ही थे | बस आप ये कर सकते हैं कि जितना हो सके जागरूकता फैलाएं एक सलीके दार व्यवहार के साथ सब सच-सच बताएं और सहज रहें, खुश रहें |
                                                               पारुल सिंह     
    
    



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parul singh

Thursday, November 5, 2015

पेशावर वाली माँ

पेशावर वाली माँ एक महीना हो गया अब चली जाओ तुम मुझे आजाद कर दो अपनी क़ैद से तुम जीती जागती भला कैसे रूह बन कर मुझ पर साया हो सकती हो? तुम भूत नहीं हो|
वो तो तुम्हारे बच्चे .....नहीं नहीं वो नाजुक नाजुक से बच्चे भूत नहीं बन गए  वो तो फ़रिश्ते हैं ।
फ़रिश्ते हैं या थे ? फ़रिश्ते होते हैं या मरने के बाद बन जाते हैं ? फ़रिश्ते होते हैं तो मर क्यूँ जाते हैं ?
नहीं वो मार दिए जाते हैं ,शैतान मार देते हैं ?
जो भी हो तुम चली जाओ मुझसे और नहीं सहा जाता तुम्हारा साथ | आजकल ठण्ड भी कितनी हैं तुम्हारे हाँ भी होगी ?
पापा का हर तीसरे दिन फ़ोन आ जाता है ।बहुत ठण्ड है आज, बच्चो को अच्छे से कपडे पहना कर रखना | पेशावर वाली माँ तुम्हारे बच्चो को भी ठण्ड लगती होगी ना । उफ़ इतनी सर्द रातो में तुम खुद से कोसो दूर सीली मिटटी में कैसे छोड़ सकती हो भला अपने बच्चो को ?अरे कैसी माँ हो तुम? हाथ और छोटी छोटी उँगलियाँ भी अकड़ गयी होगी ठण्ड में उन नाजुकबदन बालको की |अरे रहम करो उन बच्चो पर निकाल लाओ उन्हें | क्या टीस नहीं उठती सीने  में देखा ही नहीं तुमने जिगर के टुकडों को एक महीने से |  क्या छाती में कुछ कुलबुलाता नहीं जब स्कूल से वापस आते ही गले से लग कर तुम में फिर से पनाह पाने की कोशिश  याद आती है थके हारे बच्चों की ?
अरे जालिम माँ जा ले आ अपने बच्चे को बैठा दे उसे गरम कम्बल में लपेट कर और खजूर बादाम का गरम गरम दूध अपने हाथों से पिला |
जा चली जा एक तो तेरे मुझ में होने का बोझ, दूसरा तू हर वक़्त जो ये सवाल करती हैं, मैं इनके जवाब कंहा से दूँ ? जब से तू आई है मैंने दौड़ दौड़ कर बात बे बात अपनी बेटियो को गले लगाया है और जितनी बार उन्हें गले लगाती हूँ तू बांहे फैला लेती है, क्यूँ पूछती है मुझ से ?
मैं कैसे बताऊँ, क्या बताऊँ कि तू किसे बांहों में भरेगी अब, तू किस के बालो चेहरे को बोसो से ढक देगी मुझे क्या मालूम तू अब किस को छाती से चिपका कर सोएगी ?
किस की एक छोटी सी पुकार पर तू आई बेटा  कह कर रसोई से दौड़ी जाएगी ।
किस की पेंटिंग्स,प्रोजेक्ट्स देख कर तू अरे वाह शाबाश बोलेगी ।
और सुनो ये जो तुम पागलों की तरह अपलक देखती हो न, जब में नन्ही सी बेटी को उस पर अनायास उमड़ आए प्यार पर बांहों में छुपा कर 'मेरा नोना बाबू 'कहती हूँ ,ये मुझे बहुत डराता है मेरी पकड़ ढीली हो जाती है बिटिया पर |तुम से डर  कर मैं चुपचाप रसोई में जाकर बिना काम के काम निकाल लेती हूँ ।
ख़बरदार जो ये सोचा कि तुम सी होकर दिखाती हूँ तुम्हें ।नहीं नहीं मैं तुम सी नहीं
मेरे बच्चे,मेरे ज़िगर के टुकड़े साथ हैं मेरे।कोई बुरी निगाह उनका कुछ बिगड़ना क्या ऐसा सोच भी नहीं सकती ।
मैं हूँ ना ..उनकी माँ .....जब मैं हूँ,जब माँ हैं तो ,तो किसी बच्चे का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता .....ये बात सब जानते हैं मैं भी, तुम भी,दुनिया भी ।
फिर उस दिन तुमने अपने बच्चों को जाकर बचाया क्यूँ नहीं पेशावर वाली माँ ?
माँ के होते किसी को कुछ नहीं हो सकता इस विश्वास के सबसे बड़े विश्वास करने वाले बच्चे ही तो होते हैं । ओ निर्मोही जरा सोच तो उस आख़िरी वक़्त तक भी उन नन्ही जानों को भरोसा होगा के उनकी माँ बचा लेगी उन्हें ?जरा सोच तो बारूद का दर्द ज्यादा हुआ होगा ,मरने का या उस आख़िरी घड़ी पर भी जब तू बचाने नहीं पहुंची तो उनके टूटे विश्वास से टूटे दिल का ?
पता नहीं गोलियों के सितम से या तेरे न आने के सदमे में आँखे खुली की खुली रह गयी बेचारे की।
वो आख़िरी घड़ियाँ क्या क़यामत झेल चल निकले वो बहादुर शूरमा बच्चे ?
देख अब तू  और न सता, इम्तिहान आने वाले हैं बच्चो के ,अब मुझे फुरसत नहीं तू भी जा अरे अपने बच्चों का ख्याल कर, क्या कॉफ़ी नहीं देनी देर रात तक जागकर पढ़ते बच्चे को?
सुबह उनका फरमाईशी लंच बॉक्स भी बनाना होगा?
और क्या अरे आजकल बच्चों की खाने की आदते कितनी अजीब हो गयी है न मेरी बेटी को तो हर रोज कुछ नया और टेस्टी चाहिए अब हम माओं की जो हालत होती है रोज नई नई रेसिपी खोजने में क्या तेरे बच्चे को भी पास्ता और ब्रेड पिज़्ज़ा पसंद है मेरी बेटी को तो है।
बहुत उदासी होती है माहौल मे जब धूप मे मेरे पास आ बैठती है तू,और बताने लगती है किस्से अपने लाडले के, सुन वो उस दिन क्या बता रही थी तुम कि तुम्हारा बेटा कल्पना चावला को अपना आइडल मानता है वो भी नासा जाना चाहता है एस्ट्रोनाटॅ बनना चाहता है। सही है बच्चे अपना एम आजकल बहुत अच्छी तरह जानते है उनके फण्डे बडे साफ होते है जिन्दगी के बारे मे ,तू सोच वरना हमें कहाँ पता था क्या बनना है इतनी उम्र के थे जब हम। बन जाएगा, बन जाएगा ,पर.......
जानती हूँ अब कुछ नहीं होगा हर आने वाले को जाना है पर इत्ती सी उम्र मे और इस तरह जाना? ना ना पेशावर वाली माँ ऐसी मौत तो दुश्मन को भी ना आए। दुश्मन ही तो हो तुम हमारी पर यकीन कर ऐसी दुआ नहीं की थी कभी तेरे लिए ।मेरे भगवान तेरे अल्लाह की कसम ।और दुश्मन है तू तो पगली मेरे पास रोज क्यूँ आ बैठती है,क्यूँ तेरे दुख के आँसू मेरी पलकों पर आ कर जम जाते हैं । माँ हिन्दू, मुसलमान नही होती, माँ मजहब से क्या वास्ता ,वो बस अपने बच्चों की माँ होती है । कौन सा भगवान कहता है कि माँ को उसकी औलाद से ही जुदा कर दो,और अगर भगवान एक ही है तो फिर काहें का झगडा?
हमारे यहाँ भी खूब हुआ री ऐसा हमारे यहाँ क्या पूरी दुनिया मे हुआ जर्मनी,जापान,रुस मे हुआ। कुछ मिला था क्या मारने वालो को? फिर भी कुछ नही सीखा,इन्सान जानवर से तो बहुत बदतर है।
जलियांवाला बाग हुआ था तुझे याद तो होगा। उफ........
अब क्या करेगी तू, जिसकी जितनी लिखी है उतनी ही जीता है,हाँ ये तो तू सच कहती है ऐसे कोई नहीं जाता। हमारे यहाँ हर चोट का मरहम है, हमारे यहाँ अभिमन्यु भी ऐसे ही चला गया था पर उसका इलाज हमने कर लिया हमे दिल को बहलावे देने खूब आते हैं।ये कह कर कि वो किसी राक्षस की आत्मा थी,हमने दिल फुसला लिया,अभिमन्यु की  माँ सुभद्रा जब गर्भवती थी तब उसने  गलती से वो बोतल खोल ली थी जिसमे उसके भाई श्री कृष्ण ने उस आत्मा को कैद कर रखा था। और वो आत्मा गर्भस्थ शिशु अभिमन्यु के शरीर मे प्रवेश कर गई थी।
पर तुम खुद को क्या समझाओगी पेशावर वाली माँ। हम अगले जन्म की आस लगा लेते हैं तुम तो वो भी नहीं मानती । तुम खुद को कैसे सम्भालोगी। जिओगी ही कैसे अब, जब दिल की नस नस तडफेगी वो दरिंदगी याद कर के जो तेरे बच्चों पर कहर बरपा हुई तो तू खुद को कैसे माफ कर पाएगी कि तू कहाँ थी उस घडी,कि तू कुछ भी ना कर पाई अपने  नन्हें से चाँद के लिए, कि तू जिन्दा ही क्यूँ है? तू जिन्दा ही रह कर क्या करेगी पेशावर वाली माँ। इन्सानियत का तकाजा है इन्सान इन्सान के काम आए मै कुछ कर सकती तो जरूर करती तेरे नौनिहाल के लिए, जान लडा देती उसे बचाने के लिए। तू तो चली आई पर मै तो कभी तुझे बताने आ भी नही सकती कि मै तेरे गम मे अपने पति से छुप छुप कर रोज रात को रोती हूँ, कि जब तू सूजी हुई दर्द से बेहाल आँखे कुदरत  के कानून के आगे और खोले नही रह पाती और सो जाती है या बेहोस हो जाती है, क्या पता ,तो मै तुझे कम्बल उढा आती हूँ तेरे माथे पर हाथ फिरा देती हूँ, पर ये दुनिया माँ को नही समझती और माँ को दुनियादारी समझ नही आती ।तेरे गम मे शरीक हूँ पर तुझे बता  भी नहीं सकती ।
जब भी सांस आए समझना मैंने याद किया जब भी कभी बादे सबा जानी पहचानी सी लगे सोचना मैने दुआ की तेरे लिए, पर अब तू चली जा पेशावर वाली माँ मुझे अपने बच्चे पालने है,और तू तो जानती है माँ अपने बच्चो के लिए बहुत खुदगर्ज होती है वो बस अपने बच्चों के लिए सोचती है पहले। मै तेरे साथ हूँ पर तू दुश्मन देश की माँ ठहरी तेरे लिए क्यूँ रोऊं । पर है तो माँ ही री,आ गले लग जा आखिरी बार,कभी छुप कर फिर मिलेंगे अब जा चली जा पेशावर वाली माँ ।
  शामिल हूँ तेरे गम मे बहुत शर्मसार भी
लाचार हूँ खडा हूँ तमाशाईयों के साथ ।
  पारुल सिंह